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वीर सावरकर एक दृष्टि: विनायक दामोदर सावरकर

सावरकर मायने त्याग, सावरकर मायने तपश्या, सावरकर मायने तारुण्यता, सावरकर मायने क्रांति, सावरकर मायने तेज, सावरकर मायने पराक्रम, सावरकर मायने शीलता, सावरकर मायने ज्वाला, सावरकर मायने तिलमिलाहट, सावरकर मायने धैर्य, सावरकर मायने प्रतीक्षा, सावरकर मायने नवयोजन, सावरकर के कई रूप हैं, कई चेहरे हैं ,
 प्रत्यक्ष दर्शन के अवसर तो कभी प्राप्त नहीं हुए किन्तु अंडमान द्वीप की उस सेल्युलर जेल को  तस्वीरों के माध्यम से देखा है जहाँ सावरकरजी ने तिल-तिल कर जलकर अपने जीवनकाल के महत्वपूर्ण अंश का बलिदान कर दिया, सागर का किनारा, काले पानी की काली रातें, चाँद से बातें करना सावरकर ने एक-एक क्षण सदियों की भांति बिताया है, अनंत सागर के मध्य स्थित जेल चारों ओऱ अपर जलराशि, सागर से दो-दो हाँथ करने का अदम्य साहस मन में अटल दृढ़संकल्प की किसी भी परिस्थिति में  पराधीनता स्वीकार नहीं करूँगा।।
कविता और क्रांति,, जी हाँ , इन दोनों का साथ-साथ चलना दुस्तर है, कविता और भ्रान्ति का साथ हो सकता है लेकिन कविता और क्रांति का नहीं, कविता मायने कल्पना, कविता मायने शब्दों के संसार का सृजन, और इस कल्पनालोक में यदि कभी धरातल से पांव उठ जाएँ, यथार्थ से नाता टूट जाये तो आश्चर्य नहीं,, लेकिन सावरकरजी में एक क्रन्तिकारी के साथ-साथ एक प्रखर कवि भी था, सावरकर में ऊंचाई भी थी और गहराई भी, ११ बर्ष की अवस्था में बालक सावरकर ने सवाई माधव सिंह एवं दादा रानाडे पर भाष्य लिखा और यह तय कर लिया की इस स्वतंत्रता रूपी महायज्ञ में मुझे भी प्राण आहुति  देनी है, लड़कपन से सावरकर बिलक्षण प्रतिभा के धनी थे......
एक उन्माद का नाम सावरकर है, सावरकर धरा का प्रवाह है, सावरकर में वेग भी है और संवेग भी, सावरकर व्यक्ति नहीं विचार हैं, सावरकर किसी व्यक्तित्व नहीं संस्था का नाम है, सावरकर शक्ति, आशा ऊर्जा का नाम है.…
सावरकर में कुरीतियों पर प्रहार करने वाला एक प्रखर समाजसेवक भी था। दलित, शोषित,पीड़ित, वंचित, एवं हरिजनों को साथ लाने का जो अप्रतिम यत्न सावरकरजी ने किया संभवतः किसी ने किया हो॥
मन, वचन, कर्म में जिस प्रकार की  समरसता, जिस प्रकार की एकरूपता सावरकर में थी वो उनके अद्वतीय होने का प्रमाण है, सावरकर मरे नहीं, अमर है क्योंकि 'हुतात्माएँ ', 'महात्माएँ ' कभी मरती नहीं हैं, वो आज भी हमारे मन में, ह्रदय में, आत्मा में जीवित हैं, हर भारतवंशी, हर आर्यवर्ती के भीतर कहीं कहीं एक सावरकर उपस्थित है।
हम कण-कण सावरकर पर्वत हैं, हम बिन्दु तो सावरकर सिन्धु हैं, हम गागर तो सावरकर सागर के सामान विशाल हैं, हमारी और सावरकर की कोई तुलना हो नहीं सकती, इसलिए उनका व्यक्तित्व, उनका कृतित्व, उनका कवित्व वर्तमान परिदृश्य में हमें प्रेरणा प्रदान करता रहे, उनके वटबृक्ष की भांति विशाल चरित्र की पावन जड़ें हमारे हृदयों तक पहुंचे ऐसी ईश्वर से प्रार्थना  है, विनती है, और अंत में उस महामानव का चरणवंदन एवं नमन

जय हिन्द, क्रांति अमर रहे सावरकर मायने त्याग, सावरकर मायने तपश्या, सावरकर मायने तारुण्यता, सावरकर मायने क्रांति, सावरकर मायने तेज, सावरकर मायने पराक्रम, सावरकर मायने शीलता, सावरकर मायने ज्वाला, सावरकर मायने तिलमिलाहट, सावरकर मायने धैर्य, सावरकर मायने प्रतीक्षा, सावरकर मायने नवयोजन, सावरकर के कई रूप हैं, कई चेहरे हैं ,
 प्रत्यक्ष दर्शन के अवसर तो कभी प्राप्त नहीं हुए किन्तु अंडमान द्वीप की उस सेल्युलर जेल को  तस्वीरों के माध्यम से देखा है जहाँ सावरकरजी ने तिल-तिल कर जलकर अपने जीवनकाल के महत्वपूर्ण अंश का बलिदान कर दिया, सागर का किनारा, काले पानी की काली रातें, चाँद से बातें करना सावरकर ने एक-एक क्षण सदियों की भांति बिताया है, अनंत सागर के मध्य स्थित जेल चारों ओऱ अपर जलराशि, सागर से दो-दो हाँथ करने का अदम्य साहस मन में अटल दृढ़संकल्प की किसी भी परिस्थिति में  पराधीनता स्वीकार नहीं करूँगा।।
कविता और क्रांति,, जी हाँ , इन दोनों का साथ-साथ चलना दुस्तर है, कविता और भ्रान्ति का साथ हो सकता है लेकिन कविता और क्रांति का नहीं, कविता मायने कल्पना, कविता मायने शब्दों के संसार का सृजन, और इस कल्पनालोक में यदि कभी धरातल से पांव उठ जाएँ, यथार्थ से नाता टूट जाये तो आश्चर्य नहीं,, लेकिन सावरकरजी में एक क्रन्तिकारी के साथ-साथ एक प्रखर कवि भी था, सावरकर में ऊंचाई भी थी और गहराई भी, ११ बर्ष की अवस्था में बालक सावरकर ने सवाई माधव सिंह एवं दादा रानाडे पर भाष्य लिखा और यह तय कर लिया की इस स्वतंत्रता रूपी महायज्ञ में मुझे भी प्राण आहुति  देनी है, लड़कपन से सावरकर बिलक्षण प्रतिभा के धनी थे......
एक उन्माद का नाम सावरकर है, सावरकर धरा का प्रवाह है, सावरकर में वेग भी है और संवेग भी, सावरकर व्यक्ति नहीं विचार हैं, सावरकर किसी व्यक्तित्व नहीं संस्था का नाम है, सावरकर शक्ति, आशा ऊर्जा का नाम है.…
सावरकर में कुरीतियों पर प्रहार करने वाला एक प्रखर समाजसेवक भी था। दलित, शोषित,पीड़ित, वंचित, एवं हरिजनों को साथ लाने का जो अप्रतिम यत्न सावरकरजी ने किया संभवतः किसी ने किया हो॥
मन, वचन, कर्म में जिस प्रकार की  समरसता, जिस प्रकार की एकरूपता सावरकर में थी वो उनके अद्वतीय होने का प्रमाण है, सावरकर मरे नहीं, अमर है क्योंकि 'हुतात्माएँ ', 'महात्माएँ ' कभी मरती नहीं हैं, वो आज भी हमारे मन में, ह्रदय में, आत्मा में जीवित हैं, हर भारतवंशी, हर आर्यवर्ती के भीतर कहीं कहीं एक सावरकर उपस्थित है।
हम कण-कण सावरकर पर्वत हैं, हम बिन्दु तो सावरकर सिन्धु हैं, हम गागर तो सावरकर सागर के सामान विशाल हैं, हमारी और सावरकर की कोई तुलना हो नहीं सकती, इसलिए उनका व्यक्तित्व, उनका कृतित्व, उनका कवित्व वर्तमान परिदृश्य में हमें प्रेरणा प्रदान करता रहे, उनके वटबृक्ष की भांति विशाल चरित्र की पावन जड़ें हमारे हृदयों तक पहुंचे ऐसी ईश्वर से प्रार्थना  है, विनती है, और अंत में उस महामानव का चरणवंदन एवं नमन
जय हिन्द, क्रांति अमर रहे ॥                              : अभिषेक त्रिपाठी 'भारत'

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